इस ज़ियारत का सबसे भावुक हिस्सा वह है जहाँ इमाम महदी (अ.स.) फरमाते हैं:
1. सलाम की इब्तिदा (शुरुआत)
कर्बला के शहीदों पर आँसू बहाना और उनके मार्ग पर चलने का संकल्प लेना आत्मा को पवित्र करता है और गुनाहों से दूर रहने की प्रेरणा देता है। निष्कर्ष
इमाम महदी (अ.स.) कहते हैं कि यदि वे कर्बला में मौजूद होते तो अपनी जान कुर्बान कर देते, और अब वे अपनी आँखों से आँसुओं के बदले खून रोते हैं ।
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